डॉक्टरजी की अंतिम गुरुदक्षिणा
सन् 1940। नागपुर।
डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार गंभीर रूप से अस्वस्थ थे। तेज़ बुखार के कारण बिस्तर से उठना भी कठिन था। उसी समय संघ का गुरुदक्षिणा उत्सव निकट था।
एक स्वयंसेवक ने विनम्रतापूर्वक कहा, “डॉक्टरजी, इस बार आप विश्राम कीजिए। गुरुदक्षिणा में आने का कष्ट मत कीजिए।”
डॉक्टरजी ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “जिस दिन स्वयंसेवक भगवा ध्वज के सामने अपनी श्रद्धा अर्पित करेंगे, उस दिन मैं घर पर कैसे रह सकता हूँ?”
स्वास्थ्य अत्यंत खराब होने के बावजूद वे कार्यक्रम में पहुँचे। उनका शरीर काँप रहा था, लेकिन जैसे ही वे भगवा ध्वज के सामने पहुँचे, उन्होंने पूरी श्रद्धा से प्रणाम किया और अपनी गुरुदक्षिणा अर्पित की।
कार्यक्रम में उपस्थित अनेक स्वयंसेवकों की आँखें नम हो गईं। उन्हें लगा कि डॉक्टरजी अपने जीवन का अंतिम संदेश बिना शब्दों के दे रहे हैं—
“शरीर साथ दे या न दे, ध्येय के प्रति समर्पण कभी कम नहीं होना चाहिए।”
कुछ ही दिनों बाद डॉक्टरजी का देहावसान हो गया।
उस गुरुदक्षिणा की स्मृति अनेक स्वयंसेवकों के मन में जीवनभर बनी रही। वे कहते थे, “उस दिन डॉक्टरजी ने भाषण नहीं दिया था, बल्कि अपने जीवन से सिखाया था कि संघ का कार्य व्यक्ति से बड़ा है और भगवा ध्वज ही हमारा गुरु है।”
संदेश: “सच्चा स्वयंसेवक परिस्थितियों का नहीं, अपने ध्येय का अनुयायी होता है। शरीर नश्वर है, लेकिन समर्पण अमर होता है।”
